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Showing posts from June, 2021

Just like opposite poles of magnate we had attachment....

 चुंबक के विपरीत ध्रुवों की भांति प्रेम में जुड़े थे हम। काश कि विज्ञान के नियम यहां भी लागू हो जाते, और जितना भी तोड़े जाते उतने ही अस्तित्व में बने रहते हम।। Just like opposite poles of magnate, we were attached deep in love, Urge is that, may, rules of science could be implemented here and despite breaking us repeatedly we could survive in each and every part of individual magnet@Ashish Katare@

यूं कनखियोंं से न देखो, .....स्वीकार करो

यूं कनखियो से देख कर बार बार, अनदेखा करने का ना स्वांग करो। हो गया है प्यार तुम्हे खुलकर स्वीकार करो।। Stop the malodrama of watching with blink and then pretending to ignore, Come up opnly to accept that you have fallen in love

पितृ दिवस father's Day

 पिता, मेरे आदर्श है, मेरे नायक है। पिता अपने अनुशासन की हथौड़ी, और ज्ञान की छेनी से मुझे आकर दे,  अपने मंदिर में स्थापित करने वाले, शिल्पकार है। मुझमें यदि कुछ भी विलक्षण है, तो पिता इसके निर्माता आशीष है। पिता का आशीष ही मेरे ख्वाबों के पंख हैं। पिता गगन है जिन्हे हम चूमना चाहते हैं। पिता हमारे साथ साथ चलने वाले आशीष के आभामंडल है। जिनके सामने हर प्रहार विफल है, ऐसे कर्ण का कवच है पिता। मुझे जीवन संघर्ष में जिताने वाले गुरु द्रोण है। हर शत्रु के लिए परशुराम का क्रोध है। जग में किसने ईश्वर को देखा है। पिता, हर कठिनाई का हलाहल पी, हमे बचाने वाले साक्षात महाकाल है। @ आशीष कटारे @ स्वरचित पंक्तियां समर्पित है मेरे पिता को, पितृ दिवस के अवसर पर 🙏

तेरे मन की उलझन

मन मृग भटकता क्यों विजन वन वन। करता ना क्यों कुंडलिनी जागरण, तेरे तन की क्सतुरी बसी तेरे ही तन, तेरे मन की उलझन की सुलझन बसे तेरे ही मन @आशीष कटारे@ Why thu Keep Wandering In Forest O Dear (Musk) Deer. It's Musk Situated in your body  That Keeps You Puzzled. @Ashish Katare Solution of this Situation, Situated in Your mind, body.

आकर्षण

चुंम्बक  के विपरीत ध्रुवों की भांति आकर्षित थे हम। काश की विज्ञान के नियम लागू हो जाते। और जितना भी हम तोड़े जाते, उतना ही अस्तित्व में बने रहते हम। @आशीष कटारे@ जबलपुर में बिताए सुनहरे किशोर जीवन को याद करते हुए, जब मैं विज्ञान की पढ़ाई करते हुए भी ऐसे दोहे को सेकंड के अंश में सहजता से कलमबद्ध करता था।  उनमें से कुछ को याद किया जा सकता है, लेकिन उनमें से अधिकांश को भुला दिया गया है, शायद आत्मविश्वास से भरे हुए हैं, मैंने सोचा था कि भविष्य में इस तरह के दोहों को अवकाश में लिखा जाएगा, लेकिन ऐसा प्रतीत होता है जैसे मेरी कल्पना को समय और बाधाओं के कारण ग्रहण लगा, जो कि नक्काशी के लिए संघर्ष करते हुए हुआ मेरे लिए आला।  इसलिए मैं रचनात्मकता की ओर झुकाव रखने वाले युवाओं से अपील करता हूं कि वे अपने विचारों को तुरंत कलमबद्ध करें क्योंकि वे आते हैं, भले ही यह कच्चा माल बाद में उन्हें रचनात्मक प्रतिभा में परिष्कृत करने के लिए हो। @आशीष कटारे@ Reminscing golden juvenile life spent in Jabalpur when I used to pen such couplets within fraction of seconds effortlessly even while studyin...