वैशाखी को फसलें कट कर खलिहानो मे आती।श्रम सीकर का प्रतिफल देख प्रजा खुशियाँ मनाती।।किन्तु जलियावाला बागहत्याकांड की स्मृति भी सताती।अत्याचारी जनरल डायर के नाशक शहीद उद्यम सिंह की याद दिलाती।गोलियों की बौछारो ने जहाँ लाशे बिछा दी।उन शहीदों के चीत्कार की कल्पना से भी फटती है छाती।ऐसे विभत्स हत्याकांड का तो यम भी न था अभिलाषी।किन्तु तृषित कालिका उस दिन बहुत थी प्यासी।अपने रक्ताभिषेक से शहीदों ने उनकी प्यास बुझा दी।जलियांवाला बाग है उस अमर झतिहास का साक्षी।फसलें नहीं जहाँ शीष कटाकर वीरो ने मनाई वैशाखी।।स्वातंत्र्य अमृत हमे दे हलाहल पी गये बलिदानी।वीर जननि भारत माता यही संदेश पहुँचाती।ऐसी भी त्यागमयी होती है वीरो की वैशाखी!@ आशीष कटारे@ स्कूल life मे लिखी गयी मेरी कविता समर्पित है उन ज्ञात अज्ञात शहीदो को।वैशाखी को हुए जलियावाला काण्ड के 100 वर्ष पूरे होने के अवसर पर

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