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हम भी चाहते थे बाली उम्र में प्रेम की बंसी बजाना, पर रोम जलता रहे औऱ बंसी बजाना नीरो को मुबारक, हमे नही हुआ. वक्त ने हाथ में थमा दी दुंदुभि, और राण प्रारम्भ हुआ। क्या खोया क्या पाया तौलना हमने नहीं जाना है अंततः सभी को तो प्रेम के सागर परमात्म में समा जाना हैबस यही बात तो समझता नही ये जमाना है @ आशीष कटारे
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