मेरी कविताएं है बहुरूपी, अल्पभाषी मुझ सी। द्रवित करते गागर मे सगर सी। कभी झकझोरती वायु सी ।।कभी वास्तविक, विज्ञान सी, चोट देती ठोस शिला सी। ।मन, पदार्थ की तीनों आस्थाओं को परिभाषित करती सी। अब चौथी अवस्था, प्लाजमा का अनुसंधान जारी है, जो किसी पर ताप्त परग्रह में हीहो सकती है अध्यात्म सी !:@शीष कटारे

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